उसने मुझसे कहा था —

“अगर एक दिन मैं चुप हो जाऊँ,
तो तुम समझ जाना
कि मैं हार गई हूँ।”

मैं हँस दिया था।
मुझे लगा वो फिर ज़्यादा सोच रही है।

हम रोज़ बात करते थे।
लेकिन मैं हमेशा व्यस्त रहता था।
कभी मीटिंग,
कभी दोस्तों के साथ,
कभी थकान का बहाना।

वो हर बार कहती —

“कोई बात नहीं,
तुम अपने काम पर ध्यान दो।”

और मैं राहत महसूस करता।

एक दिन उसने कॉल करना बंद कर दिया।

मैंने सोचा —
शायद नाराज़ होगी।
दो दिन में खुद ही कर लेगी।

तीन दिन बीते।
फिर सात।

मैंने पहली बार उसे मैसेज किया —

“सब ठीक है?”

उसका जवाब आया —

“हाँ।”

बस यही।
कोई सवाल नहीं,
कोई शिकायत नहीं।

उस दिन मुझे अजीब लगा।

कुछ हफ्तों बाद
हम आमने-सामने मिले।

वो बदली हुई थी।
कम बात,
कम शिकायत,
कम उम्मीद।

मैंने पूछा —

“तुम पहले जैसी क्यों नहीं हो?”

उसने धीरे से कहा —

“क्योंकि अब मैं
तुमसे कुछ उम्मीद ही नहीं रखती।”

वो मुस्कुरा रही थी,
पर वो मुस्कान
पहले जैसी नहीं थी।

मैंने कहा —

“लेकिन मैं तो यहाँ हूँ।”

उसने जवाब दिया —

“तुम तब होते
जब मुझे ज़रूरत होती।”

फिर वो उठी
और जाने लगी।

मैंने पूछा —

“कहाँ जा रही हो?”

उसने पीछे मुड़कर कहा —

“वहाँ,
जहाँ मुझे
खुद को समझाने की ज़रूरत न पड़े।”

आज वो मेरी ज़िंदगी में नहीं है।

पर उसकी एक बात
अब भी मेरे अंदर गूंजती है —

लोग अचानक नहीं जाते।
वो धीरे-धीरे
आपसे उम्मीद करना छोड़ते हैं।

और जब उम्मीद मर जाती है,
तो रिश्ता भी
अपने आप ख़त्म हो जाता है।

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