“मैं ठीक हूँ।” उसने कहा… लेकिन उसकी आँखें कुछ और बोल रही थीं।

मैंने देखा।
समझा भी।
फिर भी पूछा नहीं।

क्योंकि मुझे लगा —
अगर वो सच में परेशान होगी
तो खुद बता देगी।

वो हर रात मुझे Good Night कहती थी।
मैं कभी-कभी बस Seen करके
फोन रख देता था।

उसे बुरा लगता था।
पर वो कुछ नहीं कहती थी।

एक दिन उसने मैसेज किया —
“क्या मैं तुम्हें परेशान कर रही हूँ?”

मैंने लिखा —
“नहीं, ऐसा क्यों लगा?”

उसने कहा —
“बस लगा।”

और वहीं बात खत्म हो गई।

धीरे-धीरे
उसके मैसेज छोटे होते गए।
पहले पैराग्राफ,
फिर लाइनें,
फिर सिर्फ emojis।

फिर वो भी बंद हो गए।

मैंने एक दिन पूछा —
“क्या हुआ?”

उसका जवाब आया —
“कुछ नहीं।”

लेकिन ‘कुछ नहीं’
सबसे भारी शब्द होता है।

क्योंकि उसमें
सब कुछ छुपा होता है।

कुछ हफ्तों बाद
मैंने उसे एक कैफ़े में देखा।

वो हँस रही थी।
खुलकर।
बिना किसी डर के।

मैंने पूछा —
“मुझसे ज़्यादा खुश लग रही हो।”

वो बोली —

“हाँ…
क्योंकि यहाँ
मुझे ये नहीं सोचना पड़ता
कि मैं किसी पर बोझ हूँ या नहीं।”

मैं चुप रह गया।

आज समझ आता है —
लोग छोड़ते नहीं,
वो थक जाते हैं।

बार-बार समझाने से,
इंतज़ार करने से,
और खुद को छोटा करने से।

और जब कोई
खुद से हार जाता है,
तो वो रिश्ता भी
पीछे छोड़ देता है।


अगर ये कहानी
दिल को छू गई हो,
तो Like ज़रूर करना।