“अगर मैं तुम्हें छोड़ दूँ,
तो क्या तुम मुझे ढूँढोगे?”

उसने यह सवाल एकदम अचानक पूछा था,
जैसे कोई अपने ही दिल की परीक्षा ले रहा हो।
मैंने बिना सोचे कहा —
“तुम ड्रामा बहुत करती हो।”

उस दिन पहली बार
उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी।
सिर्फ़ थकान थी।

हम पाँच साल से साथ थे।
लोग कहते थे हम perfect couple हैं।
पर किसी ने यह नहीं देखा
कि मैं हमेशा future की बात करता था
और वो present में अकेली होती जा रही थी।

मैं उसके सामने बैठकर भी
फोन में खोया रहता।
वो मेरे सामने बैठकर
मेरी आँखें ढूँढती रहती।

एक दिन उसने कहा —
“तुम्हें पता है,
मैं रोज़ अपने अंदर
थोड़ा-थोड़ा मर रही हूँ।”

मैंने इसे भी
“overthinking” कह दिया।

फिर उसने
कुछ अजीब करना शुरू किया।

वो मुझे हर छोटी बात पर
thank you कहने लगी।
मेरी कॉफी बनाने पर,
मेरे मैसेज का जवाब देने पर,
यहाँ तक कि मेरी चुप्पी पर भी।

जैसे वो
मुझसे विदा ले रही हो।

एक रात उसने मुझसे पूछा —
“अगर कोई तुम्हारे साथ
आधा प्यार करे,
तो क्या वो प्यार कहलाता है?”

मैं बोला —
“ये कैसी बातें कर रही हो?”

वो मुस्कुराई —
“बस ऐसे ही।”

फिर एक सुबह
वो चली गई।

ना झगड़ा,
ना ब्रेकअप,
ना कोई लम्बा मैसेज।

बस एक नोट था —
“मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही।
मैं खुद को बचा रही हूँ।”

मैं हँसा।
मुझे लगा वो वापस आ जाएगी।
लोग कहाँ जाते हैं,
इतने सालों के बाद?

दो हफ्ते बाद
मुझे उसकी माँ का फोन आया।
रोते हुए बोलीं —
“बेटा…
वो डिप्रेशन में थी।
बहुत गहरे।”

मुझे याद आया
वो हर रात कहती थी —
“मैं ठीक हूँ।”

डॉक्टर ने कहा —
“उसे अकेलापन मार गया।”

आज भी मैं
उसकी आख़िरी लाइन पढ़ता हूँ —

“तुमसे दूर जाना
मेरे लिए आसान नहीं था…
पर तुम्हारे पास रहकर
खुद से दूर जाना
उससे भी ज़्यादा मुश्किल था।”

और तब समझ आता है —

कुछ लोग छोड़कर नहीं जाते,
वो बस उस जगह से निकलते हैं
जहाँ उनका दिल
रहना भूल चुका होता है।


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