शीर्षक: “बोए गए शब्द”
“आरव… ज़रा खिड़की से देखो,”
नीलम ने अपने आठ साल के बेटे से धीमे स्वर में कहा,
“पड़ोस की मौसी फिर अपनी बहन से फोन पर लड़ रही हैं क्या?”
आरव उत्सुकता से खिड़की के पास गया, कान दीवार से लगा दिए।
नीलम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी — जैसे किसी राज़ का खुलासा होने वाला हो।
तभी पीछे से स्वर आया,
“नीलम, तुम क्या कर रही हो?”
यह आवाज़ थी विक्रम की — आरव के पिता।
नीलम झेंपते हुए बोली,
“कुछ नहीं… बस देख रही थी कि लोग कैसे होते हैं। बच्चों को तो दुनिया की सच्चाई बतानी ही चाहिए।”
विक्रम ने गहरी सांस ली और आरव के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा।
“सच्चाई बताने और ज़हर घोलने में फर्क होता है।”
नीलम चुप हो गई।
विक्रम बोला,
“आज जो तुम इसके कानों में भर रही हो, वही कल इसकी सोच बन जाएगी।
तुम बीज बो रही हो, नीलम… और बीज जैसा होगा, फल भी वैसा ही निकलेगा।”
नीलम ने पलटकर कहा,
“मैं तो बस इसे सतर्क बना रही हूँ।”
विक्रम हल्के से मुस्कराया।
“सतर्कता आँखें खोलती है, शक दिल बंद कर देता है।”
फिर उसने खिड़की की ओर इशारा किया,
“देखो उस पौधे को… जब हमने लगाया था तो कितना नाज़ुक था।
अगर हर रोज़ उसमें ज़हर का पानी डालते, तो क्या आज वह हरा-भरा होता?”
नीलम की आँखें भर आईं।
विक्रम ने बात आगे बढ़ाई,
“कल जब यही बच्चा किसी अपने पर शक करेगा, किसी रिश्ते को तोड़ेगा — तब हम कहेंगे कि ज़माना खराब है।
लेकिन सच ये होगा कि ज़माना नहीं… हमारी सीख खराब थी।”
आरव सब सुन रहा था।
उसे पूरी बात समझ नहीं आ रही थी,
लेकिन पिता की आवाज़ में सच्चाई की गर्माहट थी।
नीलम धीरे से बैठ गई।
“मुझसे गलती हो गई, विक्रम,”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“मैं अनजाने में इसे डर और नफरत सिखा रही थी।”
विक्रम ने उसका हाथ थाम लिया।
“गलती वही होती है जो मानी न जाए।
जिस दिन स्वीकार कर ली — उसी दिन सुधार शुरू हो जाता है।”
नीलम ने आरव को पास बुलाया।
“चलो बेटा, आज पड़ोस की मौसी के लिए चाय बना लेते हैं।
शायद हमें सुनने से ज़्यादा, समझने की ज़रूरत है।”
आरव मुस्कुरा दिया।
रसोई की ओर जाते हुए नीलम के कदम हल्के थे।
आज उसने अपने बेटे को कुछ नहीं कहा था…
लेकिन बहुत कुछ सिखा दिया था।
