आज शादी हॉल के बाहर
एक बुज़ुर्ग आदमी कोने में खड़ा था।

हाथ में एक छोटा सा गिफ्ट
और आँखों में आई हुई नमी।

मैंने पूछा —

“चाचा-जी, शादी में मेहमान हैं?”

उन्होंने हल्की मुस्कान दी —

“नहीं… मैं दूल्हे का पिता हूँ।”

मैंने आश्चर्य से कहा —

“तो अंदर क्यों नहीं?”

उन्होंने चुप रहते हुए कहा —

“कहा गया है…

स्टेज पर मत आना…

गाँव वाले कपड़े
शोभा नहीं देते…”

मेरी बात सुनकर
उनके होंठ काँप गए।

धीरे-धीरे बोलने लगे —

“मैंने मजदूरी करके
इसे शहर की पढ़ाई करवाई…

छाले मेरे हाथों में थे…

डिग्री उसके हाथ में…”

फिर आँखें पोंछकर बोले —

“आज उसकी शादी है…

पर उसने कहा —

पापा, पीछे बैठ जाना…

मेरी इमेज खराब हो जाएगी…”

इतने में अंदर से शोर हुआ —

दूल्हे की एंट्री होने वाली थी।

दूल्हा आया…

महँगा सूट… कैमरे… लाइट…

सब उसके साथ चल रहे थे।

वो स्टेज पर चढ़ा…

तभी उसकी नज़र कोने में पड़ी—

पिता झुककर
जूते के फीते बाँध रहे थे…

ता कि कोई उन पर
ठोकर न खा जाए।

दूल्हा ठिठक गया।

दुल्हन ने धीरे से पूछा —

“ये कौन हैं?”

उसने काँपती आवाज़ में कहा —

“मेरी औकात।”

उसने माइक्रोफोन उठाया —

“आज सबको अपनी सफलता दिखानी थी…

पर आज पता चला…

सफल मैं नहीं…

वो हैं,
जो मेरे लिए मिट्टी बनकर रहे।”

पूरी भीड़ चुप हो गई।

वो स्टेज से उतरा…

पिता के पैरों पर गिर पड़ा —

“पापा…

आज पहली बार शर्म आ रही है…

मेरे कपड़ों पर नहीं…

मेरी सोच पर।”

पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा —

“बेटा…

ऊँचाई आदमी की नहीं…

दिल की होनी चाहिए।”

उस दिन समझ आया —

शादी का असली गहना
सोना नहीं…

मां-बाप का सम्मान होता है।

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