“माँ… वो अंकल झूठ क्यों बोल रहे थे?”
छह साल का कबीर यह सवाल अचानक पूछ बैठा।
राधिका चौंक गई।
“कौन से अंकल?”
“वही… जो कल आए थे।
आपने पापा से कहा था न —
इन पर भरोसा मत करना।”
राधिका कुछ कह नहीं पाई।
कमरे के कोने में खड़े समीर ने यह बात सुन ली।
उसने कबीर को पास बुलाया और गोद में बैठा लिया।
“बेटा,” समीर ने पूछा,
“अगर मैं किसी के बारे में चुप रहूँ,
तो क्या वो इंसान बुरा हो जाता है?”
कबीर सोच में पड़ गया।
राधिका बोली,
“मैं तो बस इसे सच्चाई सिखा रही थी।”
समीर ने शांत स्वर में कहा,
“सच्चाई वो होती है
जो बच्चे को मजबूत बनाए,
डरपोक नहीं।”
फिर उसने अलमारी से एक काँच का गिलास निकाला।
“देखो कबीर,”
और ज़मीन पर गिलास गिरा दिया।
गिलास टूट गया।
“अब चाहे कितनी भी सफ़ाई दो,
दरार तो रहेगी ही,”
समीर बोला।
“कुछ शब्द भी ऐसे ही होते हैं।
एक बार बच्चे के मन में दरार डाल दी,
तो उसे जोड़ना आसान नहीं होता।”
राधिका की आँखें नम हो गईं।
“मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा
दुनिया से डरे,”
उसने धीमे से कहा।
समीर मुस्कुराया।
“तो फिर उसे सिखाओ
हर बात कहना ज़रूरी नहीं,
लेकिन हर बात बोना बहुत ज़रूरी है।”
अगले दिन वही अंकल फिर आए।
राधिका ने कबीर से कहा,
“बेटा, मेहमान आए हैं।
नमस्ते कहना और पानी ले आना।”
कबीर मुस्कुरा दिया।
शाम को उसने माँ से कहा,
“माँ… आज वो अंकल अच्छे लगे।”
राधिका ने उसे सीने से लगा लिया।
आज उसने कुछ नहीं कहा था…
लेकिन बहुत कुछ सिखा दिया था।
