उसने बहुत धीरे कहा था।
इतना धीरे कि
मैंने उसे गंभीर नहीं लिया।
मैंने हँसकर कहा —
“लोग बदलते नहीं, mature होते हैं।”
वो चुप हो गई।
पहले वो हर छोटी बात
मुझसे शेयर करती थी।
अब वो बातें
डायरी में लिखने लगी।
मैंने पूछा —
“मुझसे क्यों नहीं बताती?”
वो बोली —
“क्योंकि तुम सुनते नहीं,
बस जवाब देते हो।”
मुझे बुरा लगा।
पर मैंने बहस नहीं की।
फिर उसने कॉल करना बंद कर दिया।
मैंने भी कोशिश नहीं की।
क्योंकि मुझे लगा —
“अगर उसे ज़रूरत होगी
तो वो खुद आएगी।”
पर लोग
ज़रूरत में नहीं आते।
लोग तब आते हैं
जब उन्हें लगता है
कि कोई इंतज़ार कर रहा है।
एक दिन उसने आख़िरी मैसेज भेजा —
“मैं थक गई हूँ
खुद को समझाते-संभालते।”
मैंने रिप्लाई करने में
तीन घंटे लगा दिए।
जब लिखा —
“क्या हुआ?”
तो सामने से सिर्फ एक line आई —
“अब कुछ भी नहीं।”
उस दिन समझ आया —
देर से दिया गया जवाब
भी एक जवाब ही होता है।
और कभी-कभी
वही जवाब
किसी को हमेशा के लिए
खामोश कर देता है।
अगर ये कहानी
आपके दिल में कहीं रुक गई हो,
तो Like ज़रूर करना।
